टाइप-2 मधुमेह (Type 2 Diabetes in Hindi): लक्षण, कारण, निदान और उपचार

Type 2 Diabetes in Hindi

टाइप-2 मधुमेह जिसे एडल्ट ओनसेट डायबिटीज के रूप में भी जाना जाता है एक लॉन्ग-टर्म मेटाबोलिक विकार है जो खून में शक्कर की उच्चता, इंसुलिन बनने में बाधा और इंसुलिन की कमी के कारण होता है। टाइप-2 मधुमेह शरीर में ग्लूकोज बनने के तरीके को प्रभावित करता है। यह एक आजीवन बीमारी है।

यह मधुमेह मोटापे और व्यायाम की कमी के कारण होता है जबकि कुछ लोगों में दूसरों की तुलना में ज्यादातर में इसका जेनेटिक का खतरा होता है। टाइप-2 मधुमेह के लगभग 90% मामले दिखाई दिए हैं अन्य 10% मुख्य रूप से मधुमेह मेलिटस प्रकार-1 और गर्भावस्था के मधुमेह के कारण होता है।

1985 में लगभग 30 मिलियन की तुलना में, 2015 तक लगभग 392 मिलियन लोगों की बीमारी की पहचान की गयी| इसके मध्यम उम्र या बुढ़ापे में शुरू होता है लेकिन युवा लोगों में टाइप-2 मधुमेह की दर बढ़ रही है|

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टाइप-2 मधुमेह शरीर को कैसे प्रभावित करती है?

टाइप-2 मधुमेह में मांसपेशियों और लिवर में हार्मोन इंसुलिन अपनी संवेदनशीलता खोना शुरू कर देता है। पैनक्रिया शरीर के इंसुलिन प्रतिरोध को हार्मोन से भी अधिक प्रतिक्रिया देती है। मधुमेह में अतिरिक्त ब्लड शुगर पूरे शरीर की रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती है और परेशानियों का कारण बन सकती है। यह आंखों, गुर्दे, नसों और अन्य अंगों को भी गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकती है और यौन समस्याएं पैदा कर सकती है। यह दिल के दौरे और स्ट्रोक के खतरे को भी दोगुना कर सकती है।

टाइप-2 मधुमेह के कारण क्या हैं?

जीवन शैली – इस मधुमेह के विकास के लिए महत्वपूर्ण कारक मोटापा और अधिक वजन, शारीरिक गतिविधि की कमी, खराब आहार, तनाव और शहरीकरण हैं।

आहार कारक – सेचुरेटेड फैट और ट्रांस फैटी एसिड अधिक लेने से खतरा बढ़ सकता है|

जेनेटिक – अधिकतर मामलों में कई जीन होते हैं जो हर प्रकार की टाइप-2 मधुमेह बनने की बढ़ती हुई संभावना में योगदान देते हैं|

टाइप-2 मधुमेह के खतरे के कारक क्या हैं?

वजन – ज्यादा वजन या मोटापे से ग्रस्त लोगों में टाइप-2 मधुमेह मुख्य कारक हैं।

डाइटरी फैक्टर्स – व्यायाम की कमी टाइप-2 मधुमेह के लिए खतरा बढ़ा देती है। चलने जैसी शारीरिक गतिविधि वजन को नियंत्रित करने में मदद करती है, ग्लूकोज का उपयोग ऊर्जा के रूप में करती है और कोशिकाओं को इंसुलिन के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है।

पारिवारिक इतिहास – अगर माता-पिता या भाई को मधुमेह हो तो इस प्रकार की मधुमेह की संभावना बढ़ जाती है।

आयु – टाइप-2 मधुमेह का खतरा 45 वर्ष की उम्र के बाद बढ़ता है। हालांकि अब छोटे बच्चे भी टाइप-2 मधुमेह के खतरे में हैं।

प्री-डायबिटीज – ​​ प्री-डायबिटीज एक ऐसी स्थिति है जिसमें ब्लड शुगर का स्तर सामान्य से ज्यादा होता है, लेकिन मधुमेह के रूप में वर्गीकृत होने के लिए पर्याप्त नहीं है। अगर इलाज ना किया जाए तो यह मधुमेह को बधा सकता है।

गर्भावस्था में मधुमेह – यदि गर्भवती होने पर गर्भावस्था में मधुमेह होता है तो टाइप-2 मधुमेह का खतरा बढ़ जाता है।

पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम – महिलाओं में पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम होने से मधुमेह का खतरा बढ़ जाता है।

टाइप-2 मधुमेह के लक्षण क्या हैं?

प्यास बढना और लगातार पेशाब – खून के बहाव में ज्यादा चीनी बनने से यह टिश्यू से तरल पदार्थ खींचने का कारण बनता है। जिससे प्यास ज्यादा लगती है और अधिक पानी पीने से अक्सर पेशाब आ सकता है।

बढती हुई भूख – पर्याप्त इंसुलिन के बिना कोशिकाओं में चीनी कम होने की वजह से मांसपेशियों और अंगों में ऊर्जा की कमी हो जाती है जिससे तेज़ भूख लगती है।

वजन कम होना – भूख बढ़ने के बाद भी ग्लूकोज के मेटाबोलिक क्षमता के बिना भी, शरीर मांसपेशियों और फैट को ईंधन के रूप में उपयोग करने लगता है। इससे कैलोरी खो जाती है और पेशाब आने लगता है।

थकान – जब कोशिकाएं शुगर से वंचित होती हैं, तो आप थके हुए और चिड़चिडे हो सकते हैं।

धुंधली दृष्टि – जब खून में शक्कर का स्तर बहुत ज्यादा होता है तो आपकी आंखों के लेंस से तरल पदार्थ खींच सकता है जो आपका ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।

बार-बार संक्रमण – टाइप-2 मधुमेह शरीर के संक्रमण को ठीक करने और प्रतिरोध करने की की क्षमता को प्रभावित करता है।

त्वचा पर गहरे रंग की जगहें – कुछ लोगों मेंके शरीर पर गहरे रंग के धब्बे, मखमली त्वचा पर सिलवटें  और शरीर पर सिकुड़ने होती हैं जिन्हें एन्थोसिस नाइग्रिकन कहा जाता है जो इंसुलिन के प्रतिरोध का संकेत हो सकता है।

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टाइप-2 मधुमेह को कैसे पहचाना जाता है?

ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन (ए-1 सी) परीक्षण – ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन खून की जांच पिछले दो से तीन महीने की औसत ब्लड शुगर के स्तर की ओर इशारा करता है। 5.7 और 6.4 प्रतिशत के बीच परिणाम आने पर प्री-डायबिटीज माना जाता है जबकि सामान्य स्तर 5.7 प्रतिशत से नीचे माना जाता है।

रैंडम ब्लड शुगर की जांच – इस जांच में उसी समय पर खून का नमूना लिया जाता है, भले ही आपने आखिरी बार कभी भी खाया हो। 200 मि.ग्रा./ डी.एल या उससे ज्यादा की रैंडम ब्लड शुगर का स्तर मधुमेह होता है।

फास्टिंग ब्लड शुगर की जांच – रात भर भूखे रहने के बाद ली गई फास्टिंग ब्लड शुगर, यदि 100 मि.ग्रा./डी.एल से कम स्तर पर है तो यह सामान्य है, लेकिन यदि यह दो अलग-अलग परीक्षणों पर 126 मि.ग्रा./डी.एल हो तो यह उच्चतर स्तर है|

ओरल ग्लूकोज टोलेरेंस टेस्ट – भूखे रहने के बाद ब्लड शुगर को नापा जाता है, फिर पीने के लिए एक मीठा तरल बनाया जाता है और अगले दो घंटों के बाद ब्लड शुगर का स्तर नियमित रूप से नापा जाता है।

टाइप-2 मधुमेह को कैसे रोकें और नियंत्रित करें?

  • फैट और कैलोरी में कम भोजन, फल, सब्जियां और साबुत अनाज जैसे फाइबर ज्यादा खाएं।
  • दिन में कम से कम 30 मिनट के लिए मध्यम शारीरिक गतिविधि का नियमित अभ्यास टाइप-2 मधुमेह के जोखिम को रोक सकता है।
  • स्वस्थ भोजन खाने और व्यायाम करके अतिरिक्त वजन कम करें।

टाइप-2 मधुमेह का उपचार – एलोपैथिक उपचार

इसके लिए उपयोग की जाने वाली दवाओं में निम्न हैं:

मेटफॉर्मिन (ग्लूकोफेज, ग्लुमेट्ज़ा, अन्य) – यह टाइप-2 मधुमेह के लिए तय की गयी पहली दवा है जो शरीर के टिश्यूओं में इंसुलिन की संवेदनशीलता को सुधारने का काम करती है ताकि शरीर इंसुलिन का ज्यादा उपयोग कर सके|

सल्फोन्यूरियस – इन दवाओं में ग्लाइबराइड (डायाबेटा, ग्लाइनेज), ग्लिपिजाइड (ग्लुकोट्रोल) और ग्लिमेपाइराइड (एमरियल) शामिल हैं जो शरीर को अधिक इंसुलिन छिड़कने में मदद करते हैं।

मेग्लिटाइनाइड – यह सल्फोन्यूरिया की तरह काम करता है,पैनक्रिया को उत्तेजित करके इंसुलिन का बहाव बनाए रखता है और शरीर में प्रभाव की अवधि कम होती है। मेग्लिटाइनाइड में रेगग्लाइनाइड (प्रैंडिन) और नाइटग्लाइड (स्टारलिक्स) शामिल हैं।

थियाज़ोलिडाईनेडियोनस – ये दवाएं शरीर के टिश्यूओं को इंसुलिन के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती हैं और रोसिग्लिटाज़ोन (अवंदिया) और पायोग्लिटाज़ोन (एक्टोस) भी हैं।

डीपीपी-4 इन्हिबिटर्स – ये ब्लड शुगर के स्तर को कम करने में मदद मिलती है लेकिन इसका मामूली प्रभाव पड़ता है। वे वजन बढ़ने का कारण नहीं बनते और सीटग्लिप्टिन (जनुविया), सैक्सग्लिप्टिन (ओन्ग्लिज़ा) और लिनाग्लिप्टिन (ट्रेडजेन्टा) हैं।

जीएलपी-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट – ये धीमे पाचन और ब्लड शुगर के स्तर को कम करने में मदद करते हैं। उनका उपयोग अक्सर वजन घटाने से जुड़ा होता है और इसमें एक्साइनाइड (बाईटा) और लीराग्लुटाइड भी होता है।

एसजीएलटी-2 इन्हिबिटर्स – ये मधुमेह की नयी दवाएं हैं और मुख्य रूप से गुर्दे में ब्लड शुगर  को दोबारा बनने से रोकने का काम करती है। इनमें कैनाग्लिफोज़िन (इनवोकाना) और डापग्लिफ्लोज़िन होता है।

इंसुलिन थेरेपी – कुछ लोग जिन्हें यह मधुमेह है, इंजेक्शन के माध्यम से इंसुलिन लेने की जरूरत होती है। इंसुलिन के कई प्रकार हैं जिन्हें स्वास्थ्य के पहलुओं सहित कुछ कारकों के आधार पर लिया जाना चाहिए।

बैरिएट्रिक सर्जरी – 35 वर्ष से ज्यादा टाइप-2 मधुमेह और मास इंडेक्स (बीएमआई) वाले लोगों में वजन घटाने की सर्जरी (बेरिएट्रिक सर्जरी) की जरूरत हो सकती है।

टाइप-2 मधुमेह का उपचार – होम्योपैथिक उपचार

आमतौर पर उपयोग की जाने वाली होम्योपैथिक दवा यूरेनियम नाइट्रिकम, फॉस्फोरिक एसिड, सिजीजियम जंबोलानम, जिमनामा सिल्वेस्टर और सेफलैंड्रा इंडिका हैं। ये दवाएं खून में चीनी के स्तर को कम कर सकती हैं।

टाइप-2 मधुमेह – जीवन शैली के टिप्स

  • नियमित रूप से समय पर अपनी दवाएं लें।
  • फल, सब्जियों जैसे फाइबर और अनसैचुरेटेड फैट से भरपूर स्वस्थ पौष्टिक भोजन खाएं।
  • कम से कम 30 मिनट के लिए हर रोज़ व्यायाम करने की आदत डालें|
  • धूम्रपान छोड़ें और शराब कम मात्रा में पीने का प्रयास करें।

टाइप-2 मधुमेह वाले व्यक्ति के लिए क्या व्यायाम हैं?

  • हर हफ्ते कम से कम 3 बार 150 मिनट तक चलें|
  • 10 से 30 मिनट के लिए तैरें|
  • साइकिल चलाने, अन्य एरोबिक व्यायाम, दिन के 30 मिनट के लिए योग करना भी सहायक हो सकता है|

टाइप-2 मधुमेह और गर्भावस्था – जानने योग्य बातें

  • टाइप-2 मधुमेह वाली गर्भवती महिलाओं को सावधान रहना चाहिए और ब्लड शुगर के स्तर को बनाए रखना चाहिए।
  • ब्लड शुगर का ऊंचा स्तर बच्चे में प्री-टर्म प्रसव और अन्य विकास संबंधी समस्याओं का कारण बन सकता है।
  • कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवाओं को ऐसी स्थिति में उपयोग नहीं करना चाहिए|
  • आम तौर पर, प्रौढ़ शुरुआत मधुमेह वाली महिलाओं के लिए इंसुलिन थेरेपी की सिफारिश की जाती है जबकि अन्य उपचार प्रसव के बाद शुरू होते हैं।
  • स्तनपान वजन कम करने में मदद कर सकता है और यह इंसुलिन स्तर को भी सामान्य करता है|

टाइप-2 मधुमेह से संबंधित सामान्य परेशानियां

  • कार्डियोवैस्कुलर बीमारी, जिसमें हृदय रोग और स्ट्रोक शामिल हैं
  • नॉन-ट्रौमेटिक ब्लाइंडनेस
  • किडनी की खराबी
  • कोगनिटिव डिसफंक्शन और डिमेंशिया
  • एकन्थोसिस निगरिकन्स
  • यौन रोग
  • बार-बार संक्रमण

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